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प्रकृति का मानसूनी उपहार: क्यों इस मौसम में अमृत समान है नोनी का साग

बदलते मौसम का मिजाज हमारी थाली का रंग भी बदल देता है। तपती गर्मी के बाद जब मानसून की पहली फुहारें पड़ती हैं, तो धरती न केवल तृप्त होती है, बल्कि अपने आंचल से कुछ ऐसे अनमोल उपहार भी निकालती है जो विशेष रूप से इसी मौसम के लिए बने हैं। कल ही हमने बात […]

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अमृता (Amaranthus): 45°C की जानलेवा गर्मी में हमारी थाली का ‘इमोर्टल सुपरफूड साग’

उत्तर भारत में सूरज इस समय आग की लपटें बरसा रहा है। पारा 45 डिग्री के पार है, गर्म हवाएं शरीर का सारा पानी सोख रही हैं, और हमारा शरीर इस भीषण मौसम से लड़ते-लड़ते बेदम हो चुका है। इस चुभती गर्मी से बचने के लिए हम अक्सर प्रिजर्वेटिव से भरे सिंथेटिक ग्लूकोज, विदेशी सलाद

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प्रचंड गर्मी का देसी तोड़: बिना टेस्ट से समझौता किए ऐसे बनाएं जौ का सत्तू अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा

​मई-जून की इस झुलसा देने वाली गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच जब शरीर का एनर्जी लेवल डाउन होने लगता है, तो हमारा मन अक्सर ठंडी और रिफ्रेशिंग चीजों की तरफ भागता है। बाजार में मिलने वाले पैकेटबंद कार्बोनेटेड ड्रिंक्स या एडेड शुगर वाले जूस पल भर की तसल्ली तो दे सकते हैं, लेकिन

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तपती धूप का विरासती कवच: आम का टिकोला और हमारा स्वास्थ्य

इस प्रचंड गर्मी में जब सूरज आग उगल रहा है और तापमान हर दिन नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है, तब आधुनिक कृत्रिम शीतल पेय (Cold Drinks) और केमिकल वाले ग्लूकोज हमें केवल कुछ पलों का छलावा देते हैं। लेकिन हमारी भारतीय परंपरा और मिट्टी के पास इस भीषण लू का एक ऐसा जीवंत और अचूक

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​विरासत उपज: भीषण गर्मी में प्रकृति का शीतल कवच — ‘पुदीना’

जैसे-जैसे सूरज की तपिश और हवाओं की उमस हमारे शरीर की ऊर्जा को सोखने लगती है, वैसे-वैसे हमारी आंतें और पाचन तंत्र शिथिल होने लगते हैं। इस मौसमी बदलाव और भीषण गर्मी के चक्रव्यूह से बचने के लिए हमारी धरती माँ ने हमें एक बेहद सुलभ, सुवासित और शक्तिशाली जैविक धरोहर सौंपी है—पुदीना (Mint)। ​यह

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​स्क्रीन की चमक और शकरकंद का दम: डिजिटल युग में आंखों का असली ‘बॉडीगार्ड’

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हमारी उंगलियां स्क्रीन पर और आँखें पिक्सल्स पर जमी हैं। सुबह की ताज़ी हवा और प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेने के बजाय, हमारी आँखों का पहला सामना स्क्रीन की तीखी रोशनी से होता है। आज स्क्रीन टाइम सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि हमारी आँखों पर बढ़ा

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पुनर्नवा: 5000 साल पुराने चिकित्सा ग्रंथों से वैश्विक वेलनेस इंडस्ट्री तक का सफर

भारतीय उपमहाद्वीप की मिट्टी ने सदियों से ऐसे अद्वितीय पौधों को जन्म दिया है, जो न केवल हमारे स्वास्थ्य का आधार हैं बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और चिकित्सा विरासत का हिस्सा भी हैं। इसी ‘विरासत उपज’ (Heritage Produce) में एक बेहद चमकदार नाम है—पुनर्नवा (Boerhavia diffusa)। इसका शाब्दिक अर्थ ही है ‘जो बार-बार नया बना

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​आयुर्वेद का औषधीय रत्न: जानिए क्यों 2000 साल पुराना ‘नवारा चावल’ है सेहत का असली खजाना

जब हम विरासत की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान अक्सर किलों, महलों और पुरानी कहानियों पर जाता है। लेकिन भारत की असली विरासत हमारी मिट्टी और उसमें उपजे उन प्राचीन अनाजों में छिपी है, जो स्वाद के साथ-साथ इंसान को लंबी और सेहतमंद जिंदगी की गारंटी देते थे। आधुनिक हाइब्रिड फसलों के इस दौर

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सिंधु घाटी की अनमोल धरोहर: जानिए क्यों आज के दौर का अमृत है ‘खपली गेहूं’

आज जब हम अपनी रसोई में पैकेट बंद आटे से बनी रोटियां देखते हैं, तो शायद ही कभी सोचते हैं कि जो अनाज हम खा रहे हैं, उसका इतिहास क्या है? आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमने पेट भरना तो सीख लिया, लेकिन पोषण को कहीं पीछे छोड़ दिया। हाइब्रिड और जेनेटिक बदलावों (GMO)

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क्लाइमेट चेंज और सूखा: क्यों भविष्य में ‘विरासत उपज’ ही बचाएगी इंसानी सभ्यता?

आज हम सब एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ मौसम का मिजाज हर साल तेजी से बदल रहा है। कहीं असमय भारी बारिश हो जाती है, तो कहीं कड़ाके की गर्मी के बीच महीनों तक सूखे के हालात बने रहते हैं। भूजल (Underground Water) का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और

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