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​मानसून ऋतुचर्या: मूंग (Green Gram) — आयुर्वेद का सुपाच्य आधार और एक जीवंत पोषण प्रणाली

मानसून की पहली फुहारें न केवल धरती को महकाती हैं, बल्कि हमारे शरीर की आंतरिक पारिस्थितिकी (Internal Ecosystem) को भी बदल देती हैं। आयुर्वेद में इसे ‘ऋतु-संधि’ कहा गया है—एक ऐसा संक्रमण काल जहाँ हमारी जठराग्नि (Digestive Fire) मंद हो जाती है। इस दौरान आहार का चयन केवल स्वाद पर नहीं, बल्कि ‘लघुता’ (सुपाच्यता) और […]

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मानसून ऋतुचर्या: सहजन की पत्तियां (Moringa) — प्रकृति का ‘एंटी-बायोटिक’ सुरक्षा कवच

मानसून का मौसम अपने साथ नमी और कीटाणुओं का प्रसार लेकर आता है। इस ऋतु-संधि काल में जब शरीर की प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) संक्रमणों के प्रति संवेदनशील होती है, तब आयुर्वेद और परंपरा हमें सहजन (Moringa oleifera) के वृक्ष की ओर ले जाते हैं। सहजन केवल एक सब्जी नहीं, बल्कि इसे प्राचीन काल में ‘सर्व-औषधि’

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मानसून ऋतुचर्या: पुई साग (Malabar Spinach) — प्रकृति की शीतलता और सुरक्षा का आधार

मानसून के दौरान जब वातावरण में उमस (Humidity) बढ़ती है, तो आयुर्वेद के अनुसार शरीर में ‘पित्त’ का संचय होने लगता है। इस मौसम में अक्सर पेट की जलन, पाचन में सुस्ती और त्वचा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन चुनौतियों के बीच, ग्रामीण भारत की बेलों पर उगने वाला ‘पुई साग’ (Basella

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मानसून ऋतुचर्या: अरबी (Colocasia) — पारंपरिक विज्ञान और इतिहास का संगम

मानसून का आगमन न केवल प्रकृति में परिवर्तन लाता है, बल्कि हमारे शरीर की जैविक क्रियाओं में भी बदलाव का संकेत देता है। आयुर्वेद में इस काल को ‘ऋतु-संधि’ कहा गया है, जहाँ हमारी जठराग्नि (Digestive Fire) स्वभाव से मंद हो जाती है। ऐसे में भारतीय थाली में ‘अरबी’ (Colocasia esculenta) का समावेश एक उत्कृष्ट

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जून का ऋतु-परिवर्तन और ‘सीजनलिस्ट’ (Seasonalist) चॉइस: क्या इस मानसून हमारी थाली में सजना चाहिए ‘जिमीकंद’?

जैसे ही जून के अंत में मानसून की पहली फुहारें पड़ती हैं, हमारे आस-पास ‘हेल्थ और सुपरफूड’ की सलाह देने वालों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन खान-पान के मामले में किसी भी बात के पीछे आंख मूंदकर भागने के बजाय सत्य और वैज्ञानिक प्रामाणिकता को समझना जरूरी है। ​आज हम बात करेंगे एक ऐसे

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प्रकृति का मानसूनी उपहार: क्यों इस मौसम में अमृत समान है नोनी का साग

बदलते मौसम का मिजाज हमारी थाली का रंग भी बदल देता है। तपती गर्मी के बाद जब मानसून की पहली फुहारें पड़ती हैं, तो धरती न केवल तृप्त होती है, बल्कि अपने आंचल से कुछ ऐसे अनमोल उपहार भी निकालती है जो विशेष रूप से इसी मौसम के लिए बने हैं। कल ही हमने बात

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अमृता (Amaranthus): 45°C की जानलेवा गर्मी में हमारी थाली का ‘इमोर्टल सुपरफूड साग’

उत्तर भारत में सूरज इस समय आग की लपटें बरसा रहा है। पारा 45 डिग्री के पार है, गर्म हवाएं शरीर का सारा पानी सोख रही हैं, और हमारा शरीर इस भीषण मौसम से लड़ते-लड़ते बेदम हो चुका है। इस चुभती गर्मी से बचने के लिए हम अक्सर प्रिजर्वेटिव से भरे सिंथेटिक ग्लूकोज, विदेशी सलाद

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प्रचंड गर्मी का देसी तोड़: बिना टेस्ट से समझौता किए ऐसे बनाएं जौ का सत्तू अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा

​मई-जून की इस झुलसा देने वाली गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच जब शरीर का एनर्जी लेवल डाउन होने लगता है, तो हमारा मन अक्सर ठंडी और रिफ्रेशिंग चीजों की तरफ भागता है। बाजार में मिलने वाले पैकेटबंद कार्बोनेटेड ड्रिंक्स या एडेड शुगर वाले जूस पल भर की तसल्ली तो दे सकते हैं, लेकिन

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तपती धूप का विरासती कवच: आम का टिकोला और हमारा स्वास्थ्य

इस प्रचंड गर्मी में जब सूरज आग उगल रहा है और तापमान हर दिन नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है, तब आधुनिक कृत्रिम शीतल पेय (Cold Drinks) और केमिकल वाले ग्लूकोज हमें केवल कुछ पलों का छलावा देते हैं। लेकिन हमारी भारतीय परंपरा और मिट्टी के पास इस भीषण लू का एक ऐसा जीवंत और अचूक

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​विरासत उपज: भीषण गर्मी में प्रकृति का शीतल कवच — ‘पुदीना’

जैसे-जैसे सूरज की तपिश और हवाओं की उमस हमारे शरीर की ऊर्जा को सोखने लगती है, वैसे-वैसे हमारी आंतें और पाचन तंत्र शिथिल होने लगते हैं। इस मौसमी बदलाव और भीषण गर्मी के चक्रव्यूह से बचने के लिए हमारी धरती माँ ने हमें एक बेहद सुलभ, सुवासित और शक्तिशाली जैविक धरोहर सौंपी है—पुदीना (Mint)। ​यह

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