​डिजिटल सूर्यास्त: जानिए कैसे रात की कृत्रिम रोशनी आपकी कोशिकाओं के ‘डीएनए’ को नुकसान पहुंचा रही है

आधुनिक युग में हमने बिजली और स्क्रीन्स की मदद से रात को भी दिन में बदल दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारी कोशिकाएं इस बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं? हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और कैंसर रिसर्च के वैश्विक जर्नल्स ने एक बेहद डरावनी सच्चाई का खुलासा किया है, जिसे विज्ञान की भाषा […]

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सर्कैलूनार ऑसिलेशन: जानिए कैसे चंद्रमा की अदृश्य तरंगें हमारे हार्मोन्स और मूड को नियंत्रित करती हैं

अक्सर मूड स्विंग्स, अचानक बढ़ने वाले मानसिक तनाव या स्वभाव में आने वाले बदलावों के लिए हम काम के दबाव या बाहरी परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन आधुनिक एंडोक्रिनोलॉजी (Endocrinology) और न्यूरोबायोलॉजी ने एक बेहद गहरा सच उजागर किया है। हमारे शरीर का अंतःस्रावी तंत्र यानी हार्मोन्स का पूरा नेटवर्क सिर्फ २४ घंटे के

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क्रोनो-न्यूट्रिशन: ‘क्या खाएं’ से ज्यादा जरूरी है ‘कब खाएं’, जानिए सूर्य की स्थिति और पाचन का वैज्ञानिक संबंध

मोटापे, डायबिटीज और गैस-एसिडिटी से परेशान लोग अक्सर इस बात पर ध्यान देते हैं कि वे क्या खा रहे हैं—कितनी कैलोरी, कितना प्रोटीन या कितना फैट। लेकिन आधुनिक न्यूट्रिशन साइंस की एक बेहद क्रांतिकारी शाखा, जिसे क्रोनो-न्यूट्रिशन (Chrono-Nutrition) कहा जाता है, ने यह साबित कर दिया है कि गलत समय पर खाया गया पौष्टिक भोजन

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चंद्र-चक्र और हमारा मस्तिष्क: क्या पूर्णिमा की रात सचमुच आपकी नींद चुरा लेती है? जानिए लूनार रिदम का विज्ञान

जब भी हम ‘चंद्रमा’ और मानव शरीर के संबंध की बात करते हैं, तो अक्सर लोग इसे ज्योतिष या मनगढ़ंत कहानियों से जोड़ देते हैं। लेकिन आधुनिक न्यूरोसाइंस और क्रोनोबायोलॉजी (Chronobiology) ने यह साबित कर दिया है कि जैसे पृथ्वी पर समुद्र के ज्वार-भाटे चंद्रमा से नियंत्रित होते हैं, वैसे ही हमारे मस्तिष्क की गहरी

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सूर्य-संवाद: क्या आपकी आँखें रोज़ सुबह शरीर का ‘सॉफ्टवेयर’ रीसेट करती हैं? जानिए SCN पाथवे का विज्ञान

हम अक्सर सुनते हैं कि “सुबह जल्दी उठना सेहत के लिए अच्छा है।” लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Modern Medical Science) इसे महज़ एक अच्छी आदत नहीं, बल्कि हमारे जीवित रहने का सबसे महत्वपूर्ण जैविक नियम मानता है। साल २०१७ में जब तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों को क्रोनोबायोलॉजी (Chronobiology) पर चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया, तब

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जून का ऋतु-परिवर्तन और ‘सीजनलिस्ट’ (Seasonalist) चॉइस: क्या इस मानसून हमारी थाली में सजना चाहिए ‘जिमीकंद’?

जैसे ही जून के अंत में मानसून की पहली फुहारें पड़ती हैं, हमारे आस-पास ‘हेल्थ और सुपरफूड’ की सलाह देने वालों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन खान-पान के मामले में किसी भी बात के पीछे आंख मूंदकर भागने के बजाय सत्य और वैज्ञानिक प्रामाणिकता को समझना जरूरी है। ​आज हम बात करेंगे एक ऐसे

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​नवोद्भीद पोषण-दर्शन: षोडश शताब्दी के वानस्पतिक सिद्धांतों एवं समकालीन बायो-एक्टिव न्यूट्रिशन का समन्वित आलोक

१. परिप्रेक्ष्य (Perspective) ​मानव स्वास्थ्य एवं आहार-विज्ञान का इतिहास निरंतर सूक्ष्मता की ओर बढ़ने की यात्रा है। समकालीन पोषण वैज्ञानिक (Nutritional Scientists) आजकल ऐसे खाद्यों के अन्वेषण में जुटे हैं, जो अपनी न्यूनतम शारीरिक संरचना में अधिकतम पोषण घनत्व (Nutrient Density) समाहित किए हों। इस शोध के आधुनिक निष्कर्ष को आज वैश्विक स्तर पर ‘माइक्रोग्रीन्स’

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तकनीकी विश्लेषणात्मक रिपोर्ट: ब्रासिका प्रजातियों के माइक्रोग्रीन्स में पॉलीफिनोल्स प्रोफाइलिंग और आणविक संरचना का मूल्यांकन

1. परिचय एवं अनुसंधान का संदर्भ (Introduction & Context) ​नवंबर 2013 में ‘यूएसडीए’ (USDA – U.S. Department of Agriculture) और यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड द्वारा किए गए इस शोध का मुख्य उद्देश्य ब्रासिका (Brassica) कुल की पांच प्रमुख प्रजातियों—रेड कैबेज (लाल पत्तागोभी), रेड मस्टर्ड (लाल सरसों), मिजुना, टर्निप (शलगम) और अमरंथ—के माइक्रोग्रीन्स का गुणात्मक और मात्रात्मक

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प्रकृति का मानसूनी उपहार: क्यों इस मौसम में अमृत समान है नोनी का साग

बदलते मौसम का मिजाज हमारी थाली का रंग भी बदल देता है। तपती गर्मी के बाद जब मानसून की पहली फुहारें पड़ती हैं, तो धरती न केवल तृप्त होती है, बल्कि अपने आंचल से कुछ ऐसे अनमोल उपहार भी निकालती है जो विशेष रूप से इसी मौसम के लिए बने हैं। कल ही हमने बात

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अमृता (Amaranthus): 45°C की जानलेवा गर्मी में हमारी थाली का ‘इमोर्टल सुपरफूड साग’

उत्तर भारत में सूरज इस समय आग की लपटें बरसा रहा है। पारा 45 डिग्री के पार है, गर्म हवाएं शरीर का सारा पानी सोख रही हैं, और हमारा शरीर इस भीषण मौसम से लड़ते-लड़ते बेदम हो चुका है। इस चुभती गर्मी से बचने के लिए हम अक्सर प्रिजर्वेटिव से भरे सिंथेटिक ग्लूकोज, विदेशी सलाद

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