पुनर्नवा: 5000 साल पुराने चिकित्सा ग्रंथों से वैश्विक वेलनेस इंडस्ट्री तक का सफर

भारतीय उपमहाद्वीप की मिट्टी ने सदियों से ऐसे अद्वितीय पौधों को जन्म दिया है, जो न केवल हमारे स्वास्थ्य का आधार हैं बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और चिकित्सा विरासत का हिस्सा भी हैं। इसी ‘विरासत उपज’ (Heritage Produce) में एक बेहद चमकदार नाम है—पुनर्नवा (Boerhavia diffusa)। इसका शाब्दिक अर्थ ही है ‘जो बार-बार नया बना […]

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​आयुर्वेद का औषधीय रत्न: जानिए क्यों 2000 साल पुराना ‘नवारा चावल’ है सेहत का असली खजाना

जब हम विरासत की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान अक्सर किलों, महलों और पुरानी कहानियों पर जाता है। लेकिन भारत की असली विरासत हमारी मिट्टी और उसमें उपजे उन प्राचीन अनाजों में छिपी है, जो स्वाद के साथ-साथ इंसान को लंबी और सेहतमंद जिंदगी की गारंटी देते थे। आधुनिक हाइब्रिड फसलों के इस दौर

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सिंधु घाटी की अनमोल धरोहर: जानिए क्यों आज के दौर का अमृत है ‘खपली गेहूं’

आज जब हम अपनी रसोई में पैकेट बंद आटे से बनी रोटियां देखते हैं, तो शायद ही कभी सोचते हैं कि जो अनाज हम खा रहे हैं, उसका इतिहास क्या है? आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमने पेट भरना तो सीख लिया, लेकिन पोषण को कहीं पीछे छोड़ दिया। हाइब्रिड और जेनेटिक बदलावों (GMO)

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समय का ऐतिहासिक सफर: कैसे प्राचीन सभ्यताओं से शुरू होकर पहले साइंटिफिक रिसर्च तक पहुंची ‘Circadian Rhythm’

पिछले लेख में हमने जाना कि किस तरह 2017 के नोबेल पुरस्कार ने हमारे शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) को आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी खोज के रूप में स्थापित किया। लेकिन क्या शरीर और प्रकृति के इस तादात्म्य को हमने सिर्फ कुछ साल पहले ही जाना है? जवाब है—नहीं। अगर हम इतिहास

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नोबेल पुरस्कार विजेता विज्ञान: सर्कैडियन रिदम और प्रकृति की घड़ी से ‘Collective Consciousness ‘

आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल में हमने भौतिक रूप से बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन इस अंधी दौड़ में हम प्रकृति के साथ अपना गहरा और स्वाभाविक तालमेल खोते जा रहे हैं। देर रात तक स्क्रीन की आर्टिफिशियल लाइट, असमय भोजन (अनियमित ईटिंग हैबिट्स) और मानसिक तनाव ने हमारे शरीर की आंतरिक व्यवस्था को गंभीर

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क्लाइमेट चेंज और सूखा: क्यों भविष्य में ‘विरासत उपज’ ही बचाएगी इंसानी सभ्यता?

आज हम सब एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ मौसम का मिजाज हर साल तेजी से बदल रहा है। कहीं असमय भारी बारिश हो जाती है, तो कहीं कड़ाके की गर्मी के बीच महीनों तक सूखे के हालात बने रहते हैं। भूजल (Underground Water) का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और

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​दादी-नानी की रसोई की ओर वापसी: आधुनिक बीमारियों का इकलौता इलाज है ‘सच्चा भोजन’

​हममें से बहुत से लोगों को अपने बचपन का वह दौर बखूबी याद होगा, जब घर में बीमारियों के नाम पर केवल मौसमी सर्दी-खांसी हुआ करती थी। तब अस्पतालों की दौड़ आज जितनी आम नहीं थी और न ही घर की रसोई में दवाइयों के डिब्बे सजे होते थे। हमारी दादी और नानी की रसोई

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​क्या बिना यूरिया-डीएपी के खेती संभव है? विरासत फसलों का आत्मनिर्भर कृषि विज्ञान

​जब भी आज के दौर में पारंपरिक या प्राकृतिक खेती की बात होती है, तो हमारे मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है—”क्या बिना यूरिया और डीएपी (Chemical Fertilizers) के सचमुच अच्छी खेती संभव है? क्या रसायनों के बिना फसलों को कीड़ों और बीमारियों से बचाया जा सकता है?” यह सवाल उठना स्वाभाविक भी

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अस्पताल के महंगे बिल या किसान के पसीने का सम्मान? चुनिए अपनी थाली का सच

आज के इस आधुनिक दौर में हम सभी अपने परिवार को हर सुख-सुविधा देने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं। हमारी कोशिश होती है कि घर का हर सदस्य खुश रहे और सुरक्षित रहे। लेकिन अगर हम पिछले कुछ वर्षों के अपने घरेलू बजट पर गौर करें, तो एक बहुत ही चिंताजनक सच सामने

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​मिट्टी की पुकार: क्या हम अपनी जीवनदायिनी धरती का स्वास्थ्य भूल रहे हैं?

हमारे भारतीय संस्कारों और संस्कृति में ‘धरती’ को केवल ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि ‘मां’ का आदरणीय दर्जा दिया गया है। एक ऐसी जीवनदायिनी शक्ति, जिसने सदियों से बिना किसी भेदभाव के हर पीढ़ी का भरण-पोषण किया है। सुबह की पहली किरण से लेकर ढलती साँझ तक, इस मिट्टी ने हर मौसम को हंसकर

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