पिछले लेख में हमने जाना कि किस तरह 2017 के नोबेल पुरस्कार ने हमारे शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) को आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी खोज के रूप में स्थापित किया। लेकिन क्या शरीर और प्रकृति के इस तादात्म्य को हमने सिर्फ कुछ साल पहले ही जाना है? जवाब है—नहीं। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि हमारी प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आधुनिक विज्ञान के पहले लैबोरेट्री रिसर्च तक का सफर बेहद दिलचस्प और आश्चर्यजनक रहा है।
प्राचीन सभ्यताओं का कुदरती समय-चक्र
आधुनिक विज्ञान के आने से सदियों पहले, हमारे पूर्वजों के पास हाथ में बांधने के लिए घड़ी नहीं थी, फिर भी उनका जीवन आज के मुकाबले कहीं अधिक अनुशासित और व्यवस्थित था। प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों ने ‘ब्रह्ममुहूर्त’ (सूर्योदय से ठीक पहले का समय) के महत्व को पहचाना था। उन्हें भली-भांति ज्ञात था कि इस समय हमारे शरीर और दिमाग की ऊर्जा का स्तर सबसे ऊंचा होता है।
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रीक, इजिप्टियन (मिस्र) और माया सभ्यताओं ने भी अपने रोज़मर्रा के जीवन, खेती और स्वास्थ्य को सूर्य और चंद्रमा की गति के साथ जोड़ा था। उनके लिए समय का मतलब दीवार पर टंगी घड़ी नहीं, बल्कि प्रकृति का बदलता रूप और सूर्य की धूप थी।
ऐतिहासिक शुरुआत: पहला साइंटिफिक ऑब्जर्वेशन
इस विषय पर पहला दर्ज साइंटिफिक ऑब्जर्वेशन 18वीं सदी की शुरुआत में हुआ। बात आमतौर पर मानवीय शरीर से शुरू नहीं हुई, बल्कि एक नन्हे से पौधे से हुई। 1729 में, एक फ्रेंच साइंटिस्ट जीन-जैक डोर्टस डी मैरन (Jean-Jacques d’Ortous de Mairan) ने ‘मिमोसा पुडिका’ (छुई-मुई) के पौधे पर एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने देखा कि इस पौधे की पत्तियां दिन के समय खुलती हैं और सूर्यास्त के बाद बंद हो जाती हैं।
डी मैरन के दिमाग में एक सवाल उठा: क्या पौधा सूर्य की रोशनी को देखकर ऐसा करता है, या इसके अंदर अपनी कोई आंतरिक व्यवस्था (internal mechanism) है? इसको टेस्ट करने के लिए उन्होंने उस पौधे को एक बिल्कुल अंधेरे कमरे में बंद कर दिया, जहां सूर्य की एक किरण भी नहीं पहुंच सकती थी।
जो परिणाम सामने आया, उसने विज्ञान की दुनिया को चौंका दिया। पूरे अंधेरे में रहने के बावजूद, पौधे की पत्तियां ठीक उसी समय खुलती और बंद होती थीं, जैसे बाहर दिन और रात होती थी। यह इस बात का पहला ठोस वैज्ञानिक प्रमाण था कि प्रकृति ने हर जीव के अंदर एक ‘इनबिल्ट क्लॉक’ (आंतरिक घड़ी) दी है, जो बिना बाहरी रोशनी के भी काम कर सकती है।
पौधों से इंसानों तक का सफर
डी मैरन के इस रिसर्च ने आगे चलकर बायोलॉजिकल क्लॉक के अध्ययन की बुनियाद रखी। बाद में, 20वीं सदी में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह नियम सिर्फ पौधों पर ही नहीं, बल्कि कीड़े-मकोड़ों, जानवरों और सबसे बढ़कर हम इंसानों पर भी पूरी तरह लागू होता है। इंसान के शरीर के अंदर ब्लड प्रेशर का बढ़ना-घटना, हार्मोन्स का निकलना और नींद का आना—सब कुछ इसी आंतरिक चक्र से तय होता है जिसे आज हम ‘सार्केडियन रिदम’ कहते हैं।
निष्कर्ष
इतिहास और पहले साइंटिफिक रिसर्च से यह साफ है कि सर्कैडियन रिदम कोई नया कॉन्सेप्ट नहीं, बल्कि सृष्टि के निर्माण के साथ ही शुरू हुआ एक शाश्वत सच है। जब हम इस ऐतिहासिक और वैज्ञानिक सच को समझते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हमारी प्राचीन जीवन-शैली कितनी वैज्ञानिक थी। अगली कड़ी में हम जानेंगे कि किस तरह हमारे शरीर के अलग-अलग ऑर्गन्स (अंग) इस इंटरनल क्लॉक के साथ तालमेल बिठाते हैं और कैसे हम इसको अपनी आधुनिक लाइफ में सही तरीके से मैनेज कर सकते हैं।
