चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आज पूरी दुनिया ‘इम्यूनोमॉड्यूलेशन’ (Immunomodulation) और ‘सेलुलर वाइटैलिटी’ (Cellular Vitality) जैसे आधुनिक शब्दों के इर्द-गिर्द घूम रही है। जब आधुनिक बायो-मेडिकल विज्ञान यह सिद्ध करता है कि वनस्पति की शुरुआती अवस्था में ऐसे सक्रिय जैव-तत्व (Bio-active compounds) होते हैं जो मानव शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कई गुना बढ़ा सकते हैं, तो इसे एक नवीन खोज माना जाता है। परंतु, शल्य चिकित्सा के जनक आचार्य सुश्रुत ने हजारों वर्ष पूर्व ही इस संपूर्ण जैव-वैज्ञानिक रहस्य को ‘ओजस’ और ‘व्याधिक्षमत्व’ के अकाट्य सिद्धांतों के माध्यम से संहिताओं में स्थापित कर दिया था।
सुश्रुत संहिता का अचूक सूत्र और ‘ओज’ की परिभाषा
आचार्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता के सूत्रस्थान, अध्याय १५ (दोषधातुमलक्षयवृद्धिविज्ञानीय अध्याय) के श्लोक १९ से २१ के अंतर्गत शरीर के सबसे मूल्यवान तत्व ‘ओज’ का वर्णन करते हुए लिखा है:
तत्र रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत् परं तेजस्तत् खल्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते, स्वशास्त्रसिद्धान्तात् ॥
— सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान १५/१९
सरल हिन्दी अनुवाद: रस से लेकर शुक्र तक की सभी सातों धातुओं का जो परम तेज (निचोड़) है, वही वास्तव में ‘ओज’ है और उसी को शरीर का ‘बल’ कहा जाता है।
आचार्य सुश्रुत (सूत्रस्थान १५/२०-२१) में आगे स्पष्ट करते हैं कि यही ओज जब संपूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है, तो शरीर को ‘व्याधिक्षमत्व’ (रोगों से लड़ने की आंतरिक शक्ति या Immunity) प्रदान करता है।
पादप ओजस: नवांकुरों में संचित आदि-प्राण
जब इस ओजस सिद्धांत को हम वनस्पति विज्ञान (Plant Science) के दृष्टिकोण से देखते हैं, तो बीजों के अंकुरण की अवस्था इसका सबसे जीवंत उदाहरण बनती है। एक बीज जब अपनी सुषुप्तावस्था (Dormancy) को त्यागकर ‘नवांकुर’ या प्ररोह के रूप में फूटता है, तो उस समय उस नन्हे पौधे के भीतर पूरी वनस्पति का ‘परम तेज’ यानी ‘ओज’ अपने सबसे सक्रिय और शुद्धतम रूप में केंद्रित होता है।
प्राचीन संहिताओं के अनुसार, मिट्टी से प्रकट होती हुई वे दो नन्हीं हरी कोमल पत्तियां असल में उस पौधे के ओजस का प्रकटीकरण हैं। इस अवस्था में पौधे के भीतर जीवन को विस्तार देने की प्रचंड जीवनी शक्ति (Vital Energy) होती है। जब मानव इस आदि-ओज से परिपूर्ण प्ररोहों का सेवन करता है, तो यह शरीर में जाकर हमारी सातों धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) को त्वरित पोषण देकर हमारे आत्मिक और शारीरिक बल (Immunity) को चरम पर पहुंचा देता है।
आधुनिक जैव-चिकित्सीय (Biomedical) सहसंबंध
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास जिसे मापने के लिए लैबोरेट्री टेस्ट हैं, आयुर्वेद ने उसे सूक्ष्म दृष्टि से पहले ही देख लिया था। आधुनिक शोधों के अनुसार, दो पत्तियों की इस शुरुआती अवस्था में पौधों के भीतर इम्यूनोमॉड्यूलेटरी पेप्टाइड्स (Immunomodulatory Peptides), एक्टिव एंटीऑक्सीडेंट्स (Antioxidants Surge) और प्राकृतिक पाचक एंजाइम्स का घनत्व अपने उच्चतम शिखर पर होता है।
सुश्रुत संहिता का ‘व्याधिक्षमत्व’ सिद्धांत और आधुनिक विज्ञान का ‘Immunity’ का नियम यहाँ एक ही बिंदु पर आकर मिलते हैं। यह नन्हे प्ररोह हमारे इम्यून सेल्स (जैसे T-cells और Macrophages) को सक्रिय करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।
निष्कर्ष: आदि-ज्ञान के प्रति गहरी कृतज्ञता
सुश्रुत संहिता का यह १५वां अध्याय हमें यह सिखाता है कि उत्तम स्वास्थ्य का मार्ग किसी कृत्रिम सप्लीमेंट में नहीं, बल्कि प्रकृति के इस आदि-ओज में छुपा है। मिट्टी से फूटते इन नन्हे नवांकुरों को अपने जीवन का हिस्सा बनाना केवल एक आहार पद्धति नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा की वैज्ञानिक गरिमा के प्रति गहरे आदर और कृतज्ञता को प्रकट करना है। यह आदि-विज्ञान ही हमारे पूर्ण आरोग्य का शाश्वत आधार है।
